सत्ता का अहंकार और जनता का प्रतिकार

रवि अरोड़ा

भारतीय राजनीति में जनता जनार्दन का मिजाज बदलते देर नहीं लगती । जनता की भावनाओं और समस्याओं से कटा नेता जब तक सत्ता में है, तब तक ही उसके आगे-पीछे अफसरों, कार्यकर्ताओं, व्यापारियों और अवसरवादियों की भीड़ लगी रहती है। उसकी एक मुस्कान पर लोग धन्य हो जाते हैं और उसकी नाराज़गी से लोग कांपने लगते हैं। लेकिन जैसे ही कुर्सी हाथ से निकलती है, नेता जी का अचानक वास्तविक दुनिया से परिचय होने लगता है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के नेता अभिषेक बनर्जी की जो परेड हाल ही में पब्लिक ने कराई उससे इस प्रवृत्ति को फिर चर्चा में ला दिया है। बैनर्जी के सोनारपुर दौरे के दौरान लोगों ने न केवल नारेबाजी की अपितु घेर कर अंडे और अन्य वस्तुएं भी उन पर फेंकी । यह घटना निस्संदेह दुर्भाग्यपूर्ण थी और किसी भी लोकतंत्र में शारीरिक हिंसा स्वीकार्य नहीं हो सकती लेकिन इस घटना ने एक बड़ा प्रश्न तो खड़ा कर ही दिया है क्या सत्ता में रहते हुए नेताओं ने कभी यह सोचा कि आम नागरिक उनके व्यवहार को कैसे याद रखता है? भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जहां सत्ता में बैठे नेताओं ने जनता को लगभग बेवकूफ ही समझ लिया। जरा सा भी लिहाज नहीं और जहां दांव लगा, वही हाथ मार दिया । चुनाव जीतते ही गिरगिट की तरह ऐसा रंग बदला मानो जनता ने उन्हें सेवक नहीं बल्कि शासक नियुक्त कर दिया हो। यही कारण है कि जब सत्ता बदलती है तो वर्षों से दबा हुआ आक्रोश अचानक सतह पर आ जाता है। जनता वोट के जरिए जवाब तो देती ही है साथ ही मौका पाकर अपनी नाराज़गी को बहुत कठोर रूप में भी व्यक्त कर देती है। कोई इसे किसी भी नजर से देखे मगर यह आज की सच्चाई है । पश्चिम बंगाल में जो हुआ वह ऐसी पहली घटना नहीं है। आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी तक को जनता के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा था। 1977 के चुनावों के दौरान एक रैली में हमारे ही शहर के युवक ने उनका कस कर हाथ पकड़ लिया था । आप नेता अरविंद केजरीवाल संभवतः इस मामले में भारत के सबसे अधिक चर्चित नेता हैं जिन्हें सार्वजनिक कार्यक्रमों में कई बार थप्पड़ मारा गया या उन पर हमला करने की कोशिश हुई। महाराष्ट्र के दिग्गज नेता शरद पवार भी नई दिल्ली में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान थप्पड़ खा चुके हैं। भ्रष्टाचार के मामले में सर्वाधिक बदनाम हुए सुखराम के साथ तो कई अवसरों पर धक्का-मुक्की हुई । नवीन जिंदल भी अपनी चुनावी सभा में पिट चुके हैं। ओम प्रकाश चौटाला तथा उनके परिवार के कुछ सदस्यों को तो कुछ हमदर्द नहीं बचाते तो भीड़ के हाथों उनकी हत्या भी हो सकती थी । पब्लिक जिन्हें अपने हाथों से ठीक नहीं कर पाती उन्हें अपनी दुत्कार और उपेक्षा से सबक सिखाती है। याद कीजिए कई राज्यों में ऐसे मुख्यमंत्री भी हुए जिनके सामने अफसर कांपते थे, लेकिन सत्ता जाने के बाद वे सार्वजनिक जीवन में लगभग अप्रासंगिक हो गए। कभी जिन नेताओं के काफिले के लिए सड़कें खाली करा दी जाती थीं, बाद में वही नेता आम सभाओं में हूटिंग का सामना करते दिखाई दिए। दरअसल समस्या केवल व्यक्तियों की नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति की है। भारत में अनेक दल लोकतांत्रिक संगठन कम और व्यक्तिपूजक संरचनाएं अधिक बन गए हैं। नेता के आसपास ऐसा वातावरण तैयार कर दिया जाता है जिसमें उसे वास्तविक जनभावना का पता ही नहीं चलता। उसके आसपास केवल प्रशंसकों और लाभार्थियों की भीड़ रह जाती है। परिणाम स्वरूप उसे लगता है कि जनता तो हमेशा उसके साथ रहेगी। लेकिन जनता का हिसाब अलग होता है। वह सब कुछ नोट करती है । नतीजा चुनाव परिणाम कई बार केवल सरकार नहीं बदलते, बल्कि जनता के मन का जमा हुआ फैसला भी सामने लाते हैं। बेशक किसी नेता पर हमला, मारपीट या जानलेवा हमला लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। जनता का सबसे बड़ा हथियार वोट, जनमत और सार्वजनिक प्रतिरोध है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जो नेता वर्षों तक जनता की भावनाओं को कुचलते हैं, उन्हें सत्ता से बाहर होने के बाद इसी प्रकार तो वास्तविक जनभावना का पता चलता है। आपको हर शहर में ऐसे नेता मिल जाएंगे जिनकी कभी तूती बोलती थी मगर अब कोई टके सेर भी नहीं पूछता । अहंकार की राजनीति को एक नई ऊंचाई देने वाले सपा नेता अमर सिंह को क्या कोई भूल सकता है ? प्रदेश का मुख्यमंत्री, सिनेमा के बड़े स्टार, उद्योग जगत की तमाम बड़ी हस्तियां कौन कौन नहीं था उसके आभा मंडल के तले मगर अंत में क्या हुआ ? आखिरी पलों में किसीं ने हाल नहीं पूछा । वह अमिताभ बच्चन जो अमर सिंह की बदौलत ही अपने कर्जों से बाहर आये, उन्होंने भी खैर खबर नहीं ली । लगभग सौ करोड़ रुपए की अपनी संपत्ति की घोषणा अमर सिंह ने अपने आखिरी चुनाव में की थी । लेकिन अब कहां है वह संपत्ति ? चर्चा है कि पत्नी दोनों बेटियों को लेकर विदेश जा बसी है और सारी संपत्ति पर अब एक सिनेमा तारिका का कब्जा है। तो फिर किसके लिए किए थे अमर सिंह ने इतने दंद फंद ? केवल अमर सिंह की ही क्यों बात करें, आज की राजनीति में नीचे से ऊपर तक क्या कम हैं अमर सिंह सरीखे नेता ? जनता की गाढ़ी कमाई से लूटा गया इनका पैसा भी पता नहीं इनकी औलादों के काम आएगा भी या कोई और ले उड़ेगा ।

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