राम मंदिर नहीं राजनीतिक विश्वसनीयता में भी सेंध

रवि अरोड़ा
अयोध्या के राम मंदिर में चोरी के मामले से मुल्क में राजनीतिक तूफान के आसार बनते नजर आ रहे हैं। सब जानते हैं कि यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं है बल्कि स्वतंत्र भारत के सबसे लंबे और प्रभावशाली राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों में से एक का परिणाम भी है। दशकों तक चले इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी थी । इसने अनेक सरकारों को प्रभावित भी किया और अंततः राम मंदिर निर्माण के रूप में अपने लक्ष्य तक पहुंचा। इसी कारण राम मंदिर को केवल एक धार्मिक परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी और व्यापक हिंदुत्व आंदोलन की एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में भी देखा जाता है। ऐसी स्थिति में यदि मंदिर के प्रशासन, चढ़ावे के प्रबंधन या वित्तीय पारदर्शिता को लेकर कोई घपला सामने आता है तो उसका प्रभाव केवल मंदिर तक कैसे सीमित रह सकता है । यह कैसे संभव है कि इसके छींटे भाजपा और उसके पितृ संगठन आरएसएस जैसी उन राजनीतिक सामाजिक शक्तियों तक न पहुंचे जिनका नाम इस परियोजना से गहराई से जुड़ा हुआ है। क्या यह किसी से छुपा है कि पहले दिन से इन्हीं संगठनों के लोग मंदिर की व्यवस्था देख रहे हैं और उनकी मर्जी के बगैर वहाँ पत्ता भी नहीं खड़क सकता । यही तो कारण है कि दान पात्र में चोरी की खबरों से यह सवाल अब हवाओं में है कि क्या इससे भाजपा की विश्वसनीयता को प्रभावित होने से रोका भी जा सकेगा ?

राजनीति में प्रतीकों का महत्व अत्यंत बड़ा होता है। राम मंदिर भाजपा के लिए केवल एक चुनावी मुद्दा ही नहीं था अपितु यह उसकी वैचारिक पहचान का केंद्रीय प्रतीक भी रहा है । जब कोई दल किसी परियोजना को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करता है, तो जनता उसकी सफलताओं के साथ-साथ उससे जुड़ी कमियों और विवादों को भी उसी दल से जोड़कर देखने लगती है। सारी दुनिया ने देखा कि भाजपा ने कदम कदम पर इस मंदिर के निर्माण को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया । शिलान्यास से लेकर उदघाटन तक हर कार्यक्रम में मोदी जी ने मुख्य यजमान की भूमिका निभाई । ऐसे में यदि मंदिर प्रबंधन में किसी प्रकार की गंभीर अनियमितता सामने आती है तो राजनीतिक रूप से उसके प्रभाव से भाजपा पूरी तरह कैसे बच सकती है। हालांकि यह भी सच है कि किसी मंदिर में चोरी या वित्तीय गड़बड़ी का होना और उसका राजनीतिक दायित्व तय होना दो अलग-अलग बातें हैं। मगर जनता आमतौर पर यह अंतर नहीं समझती है कि अपराध किसी व्यक्ति ने किया है या संस्था ने। और यूं भी जब कोई संस्था अत्यधिक राजनीतिक महत्व प्राप्त कर लेती है तब जनता केवल कानूनी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नैतिक और प्रशासनिक जवाबदेही भी तलाशती है। भाजपा ने सदैव स्वयं को अपेक्षाकृत अधिक अनुशासित, राष्ट्रवादी और भ्रष्टाचार-विरोधी विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है। ऐसे में यदि किसी ऐसे संस्थान में जो उसके वैचारिक अभियान का प्रतीक माना जाता है, वित्तीय अनियमितताओं का हल्ला होने लगे, तो विरोधी दल इसे उसकी नैतिक विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाने के अवसर के रूप में उपयोग करेंगे ही ।

यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि मंदिर की गुल्लक में गबन का दूरगामी प्रभाव सामने आ सकते हैं । पहला प्रभाव तो नैतिकता का ही है। इससे श्रद्धालुओं को यह महसूस होने से रोका नहीं जा सकेगा कि मंदिर प्रशासन अपेक्षित पारदर्शिता नहीं रख पा रहा है, तो इससे निराशा पैदा हो सकती है। मंदिर में चढ़ावे की राशि में कमी आने की खबरें इस ओर इशारा भी करती हैं। बेशक यह निराशा सीधे राजनीतिक विरोध में परिवर्तित हो जाए, ऐसा आवश्यक नहीं है, लेकिन इससे उस नैतिक पूंजी को क्षति तो पहुंच ही सकती है जिसे वर्षों के आंदोलन से अर्जित किया गया था। दूसरा, विपक्ष ऐसे मामलों को यह कहकर जोर शोर से उठाने का प्रयास अवश्य करेगा कि जो दल स्वयं को सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों का संरक्षक बताता है, वह अपने सबसे महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक संस्थान में भी पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं कर सका, उससे अन्य क्या उम्मीद की जाए । हालांकि सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करने का कोई बड़ा आधार अभी किसी के पास नहीं है मगर पहली बार बिना एफआईआर दर्ज कराए एसआईटी से जांच की घोषणा कर सरकार ने संदेह के बादल तो गहरा ही गए हैं। क्या यह अनुमान लगाना कठिन है कि अगले साल होने जा रहे राज्य के विधानसभा सभा चुनावों में यह चोरी प्रमुख मुद्दा बनने जा रहा है। अलबत्ता इस चोरी के सभी दोषियों को उचित सजा के साथ साथ भविष्य में अधिक पारदर्शिता, स्वतंत्र ऑडिट, सार्वजनिक लेखा-जोखा और जवाबदेही तय कर सरकार चाहे तो कुछ डैमेज कंट्रोल अवश्य कर सकती है।

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