गाजियाबाद। भारत में जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरणीय विमर्श का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह आजीविका और श्रमिकों के जीवन से जुड़ा एक गंभीर संकट बन चुका है। लगातार बढ़ती लू, अनियमित मानसून तथा समुद्र के जलस्तर में वृद्धि भारत के श्रमबल की आजीविका और रोजगार की स्थिरता के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर रहे हैं। इसका सबसे अधिक प्रभाव असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर पड़ रहा है। इसी को लेकर 25 अक्टूबर यानी आज हैदराबाद में कार्यशाला आयोजित की जा रही है। इसमें पूरे देश से ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है। उत्तर प्रदेश से भी राष्ट्रीय सीमांत किसान मजदूर यूनियन (हिन्द मजदूर सभा) के अध्यक्ष रविपाल सिरोही भी इस कार्यशाला में भाग लेने के लिए हवाई जहाज से हैदराबाद पहुंचे हैं। हैदराबाद से उन्होंने कार्यशाला के संबंध में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन का असंगठित क्षेत्र के कामगारों की आजिविका पर पड़ने वाले प्रभाव पर एफईएस द्वारा एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला 25/10/2026 हैदराबाद (तेलंगाना) में आयोजित की गई है जिसमें हिन्द मजदूर सभा की ओर से उन्हें आमंत्रित किया गया था। उन्होंने बताया कि कृषि मजदूर, निर्माण श्रमिक, खनन श्रमिक, मछुआरे, परिवहन श्रमिक, गिग वर्कर्स, रेहड़ी-पटरी विक्रेता, वन श्रमिक तथा अन्य असंगठित क्षेत्र के कामगार अपने स्वास्थ्य, आय और रोजगार की सुरक्षा से संबंधित बढ़ते जोखिमों का सामना कर रहे हैं। इसके बावजूद, जलवायु संबंधी नीतियाँ तैयार करते समय श्रमिकों तथा उनके प्रतिनिधि संगठनों के साथ व्यवस्थित परामर्श की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।
भारत को तत्काल श्रमिक-केंद्रित जलवायु दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। वर्तमान में जलवायु संबंधी नीतियाँ अलग-अलग क्षेत्रों में समन्वय के अभाव में बनाई जा रही हैं तथा प्रभावित श्रमिकों के साथ व्यवस्थित परामर्श नहीं किया जाता है। भारत को ऐसे दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो रोजगार की अनदेखी किए बिना आर्थिक एवं पर्यावरणीय बदलावों को आगे बढ़ाए तथा पर्यावरणीय स्थिरता और सामाजिक न्याय के बीच समन्वय स्थापित करे। जलवायु परिवर्तन के कारण अनेक प्रकार की संवेदनशीलताएँ उत्पन्न हो रही हैं, जिनमें स्वास्थ्य संबंधी जोखिम, आर्थिक अस्थिरता तथा विवश होकर पलायन करना प्रमुख हैं।
निर्माण कार्य, कृषि तथा रेहड़ी-पटरी व्यवसाय जैसे क्षेत्रों में कार्यरत बाहरी और असंगठित श्रमिकों को अत्यधिक गर्मी के कारण लू लगने, निर्जलीकरण तथा श्वसन संबंधी बीमारियों जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। तापमान में लगातार वृद्धि के बावजूद, इन श्रमिकों के लिए सुरक्षा मानक या तो उपलब्ध नहीं हैं अथवा उनका प्रभावी ढंग से अनुपालन नहीं कराया जाता है।
फसलों की बर्बादी, मछलियों की घटती उपलब्धता तथा चरम मौसमी घटनाओं के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आय और आजीविका प्रभावित हो रही है। इसके अतिरिक्त, हरित ऊर्जा की ओर बढ़ते बदलाव से कोयला खनन तथा ताप विद्युत क्षेत्र में कार्यरत लाखों श्रमिकों के रोजगार पर संकट उत्पन्न होने की आशंका है। इन श्रमिकों के पुनर्वास, वैकल्पिक रोजगार तथा आजीविका की सुरक्षा के लिए अभी तक कोई स्पष्ट और समुचित कार्ययोजना उपलब्ध नहीं है।
पर्यावरणीय क्षरण के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन बढ़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप श्रमिकों को ऐसे असुरक्षित और अनिश्चित रोजगार में काम करने के लिए विवश होना पड़ता है, जहाँ न तो उनके पास औपचारिक रोजगार अनुबंध होते हैं और न ही पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा तथा सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति उपलब्ध होती है।
उपरोक्त परिस्थितियों से स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण से संबंधित मुद्दा नहीं है, बल्कि यह आर्थिक स्थिरता, कार्यस्थल की सुरक्षा तथा श्रमिकों के अधिकारों से जुड़ा एक गंभीर संकट है।
कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण से विभिन्न उद्योगों की कार्यप्रणाली में मूलभूत परिवर्तन होंगे। इससे रोजगार की सुरक्षा, औद्योगिक संरचना तथा कार्य परिस्थितियाँ प्रभावित होंगी।
ट्रेड यूनियनों के लिए जलवायु परिवर्तन औद्योगिक संबंधों से जुड़ा एक प्रमुख विषय है, क्योंकि इसका सीधा प्रभाव सुरक्षित कार्य परिस्थितियों, रोजगार की सुरक्षा, सामाजिक संरक्षण तथा सामूहिक सौदेबाजी के अधिकारों पर पड़ता है।
यदि यह संक्रमण मुख्यत: कॉरपोरेट हितों के नेतृत्व में संचालित होता है, तो इससे सामाजिक एवं आर्थिक असमानताएँ और अधिक गहरी हो सकती हैं। अत: कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण को न्यायसंगत संक्रमण के सिद्धांतों के अनुरूप सुनिश्चित करना आवश्यक है।
ट्रेड यूनियनों की सक्रिय भागीदारी के अभाव में जलवायु परिवर्तन से निपटने की प्रक्रिया कॉरपोरेट-केंद्रित, रोजगार की आवश्यकताओं की अनदेखी करने वाली तथा सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत हो सकती है।
ट्रेड यूनियनें यह सुनिश्चित करने में विशिष्ट भूमिका निभा सकती हैं कि इस परिवर्तन की प्रक्रिया में कोई भी श्रमिक पीछे न छूटे। जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को प्राथमिकता देकर ट्रेड यूनियनें न्यायसंगत संक्रमण को बढ़ावा दे सकती हैं, श्रमिकों की आजीविका की रक्षा कर सकती हैं, हरित रोजगार के अवसरों को सुरक्षित कर सकती हैं तथा सामाजिक न्याय को सुदृढ़ बना सकती हैं।
इस कार्यशाला का उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत ट्रेड यूनियन नेताओं के बीच विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करना, उनके-अपने क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों और नवीन घटनाक्रमों को साझा करना तथा जलवायु संबंधी कार्रवाई को सामूहिक सौदेबाजी और नीतिगत एजेंडे का अभिन्न अंग बनाने के लिए आवश्यक रणनीतियाँ विकसित करना है। केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के रूप में हमारे पास एक ऐतिहासिक अवसर है कि हम सामूहिक रूप से एकजुट होकर जलवायु परिवर्तन के संबंध में एक साझा दृष्टिकोण वक्तव्य अथवा साझा मांग-पत्र तैयार करें। इस साझा दृष्टिकोण के माध्यम से भारत की जलवायु संबंधी नीतियों एवं कार्ययोजनाओं में न्यायसंगत संक्रमण, व्यावसायिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा, सामाजिक संरक्षण तथा सरकार, नियोक्ताओं और श्रमिक संगठनों के बीच त्रिपक्षीय संवाद को संस्थागत रूप से शामिल करने की दिशा में प्रयास किए जा सकते हैं।
कार्यशाला का उददेश्य विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न चुनौतियों के संबंध में आपसी अनुभवों, विचारों और ज्ञान का आदान-प्रदान करके ट्रेड यूनियनों की क्षमता का विकास करना। विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत ट्रेड यूनियनों के बीच समन्वित एवं एकीकृत रणनीति विकसित करना तथा जलवायु परिवर्तन के संबंध में साझा ट्रेड यूनियन मांगों को तैयार करना। राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर गठित जलवायु संबंधी कार्यबलों, समितियों तथा अन्य नीति-निर्माण निकायों में ट्रेड यूनियनों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करना। पुन: कौशल विकास, उचित मुआवजे तथा त्रिपक्षीय संवाद के सिद्धांतों पर आधारित सम्मानजनक एवं सुरक्षित रोजगार के माध्यम से न्यायसंगत संक्रमण सुनिश्चित करना। जलवायु परिवर्तन तथा न्यायसंगत संक्रमण से संबंधित मुद्दों पर निरंतर कार्य करने के लिए एक राष्ट्रीय जलवायु कार्य समूह का गठन करना। इस कार्यशाला में केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठनों के ऐसे 4 से 5 नेता अथवा नामित प्रतिनिधि/प्रभारी व्यक्ति भाग ले रहे हैं जो जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित प्रमुख क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले ट्रेड यूनियन नेता; अथवा केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठनों में जलवायु परिवर्तन एवं न्यायसंगत संक्रमण से संबंधित मुद्दों पर कार्य करने वाले नामित प्रतिनिधि/प्रभारी व्यक्ति हैं।

