रवि अरोड़ा
बचपन गरीबी में बीता। शायद आपका भी । जब देश ही गरीब था तो हम आप कैसे अमीर होते । आज आसपास बिखरी हुईं तमाम सुविधाएं तब नहीं थीं। आज़ादी के 80वें वर्ष में प्रवेश करते समय कम से कम इस विकास पर तो संतोष होता ही है। 1947 में जब स्वतंत्र हुए तब हमारे सामने गरीबी ही नहीं अशिक्षा, बेरोज़गारी, विभाजन की त्रासदी और एक कमजोर अर्थव्यवस्था जैसी तमाम चुनौतियाँ थीं। आज पीछे मुड़कर देखें तो लगता है कि हमने बहुत कुछ हासिल कर लिया मगर जब जब आत्ममुग्धता की जद में जाते हैं तब तब दर्जनों दुश्वारियां रास्ता रोक लेती हैं। क्या आठ दशक की मुल्की यात्रा का सही मूल्यांकन वही नहीं होगा जिसमें हम अपनी उपलब्धियों के साथ अपनी विफलताओं और कमियों को भी स्वीकार करने का साहस दिखाएं ?
कह सकते हैं हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि तो यही रही कि भारत ने लोकतंत्र को जीवित रखा। आज जब अनेक देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था या तो समाप्त हो गई है या कमजोर पड़ गई, वहीं भारत में आज भी सत्ता का हस्तांतरण चुनावों के माध्यम से होता रहा। बेशक चुनावी धांधलियां, पैसे का प्रभाव और सत्ता के दुरुपयोग जैसे आरोप लगते हैं मगर फिर भी संविधान, कच्चे पक्के इदारों, स्वतंत्र न्यायपालिका, चुनाव आयोग और संघीय ढांचे ने देश की एकता को मजबूत तो बनाए ही रखा। क्या यह छोटी उपलब्धि है ?
कभी खाद्यान्न के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहने वाला भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। हरित क्रांति ने खाद्य सुरक्षा दी तो अंतरिक्ष कार्यक्रम ने हमें वैश्विक सम्मान दिलाया । सूचना प्रौद्योगिकी ने भारतीय प्रतिभा को पूरी दुनिया में पहचान दिलाई तो मोबाइल, डिजिटल भुगतान, आधार, इंटरनेट और तेजी से बढ़ते बुनियादी ढांचे ने भारत के बदलते स्वरूप को दुनिया के सामने रखा । शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी विस्तार हुआ है और विश्वविद्यालयों, इंजीनियरिंग और मेडिकल संस्थानों की संख्या में भी खूब इजाफा हुआ । आम आम भारतीय की जीवन प्रत्याशा बढ़ी है और अनेक संक्रामक रोगों पर भी नियंत्रण पाया जा चुकी है। यह भी क्या कम बड़ी उपलब्धि है कि हजार साल की गुलामी और दमन की शिकार हमारी महिलाएं अब शिक्षा और रोजगार में बढ़ चढ़ कर भागीदारी निभा रही हैं । लेकिन इसके बावजूद एक महत्वपूर्ण सवाल पीछे नहीं छूट जाता कि क्या विकास का लाभ हर भारतीय तक समान रूप से पहुंचा है? क्या आर्थिक विकास के बावजूद आय और संपत्ति की असमानता गंभीर चिंता का विषय नहीं है ? एक तरफ विश्वस्तरीय सुविधाओं से लैस महानगर हैं तो दूसरी तरफ ऐसे गांव और कस्बे हैं जहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ पानी और रोजगार अभी भी पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंचे हैं। हमारे शहर आर्थिक गतिविधियों के केंद्र तो बने मगर उसके साथ ही प्रदूषण, ट्रैफिक, अनियोजित निर्माण और कचरा प्रबंधन जैसी समस्याएं भी सुरसा के मुख की तरह बढ़ती चली गईं। हम शिक्षित लोगों की संख्या तो बढ़ा सके मगर शिक्षा की गुणवत्ता को उस स्तर तक नहीं ले जा सके जिसकी नई अर्थव्यवस्था को आवश्यकता है। हमारी बड़ी आबादी आज भी डिग्री और रोजगार के बीच फंसी हुई है। क्या युवाओं को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं बल्कि रोजगार पैदा करने वाला बनाने की आवश्यकता नहीं है ? किससे छुपा है कि सामान्य नागरिक के लिए गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा अभी भी दूर की कौड़ी है ग्रामीण इलाकों में कुपोषण और मातृ-शिशु स्वास्थ्य जैसी समस्याएं भी पूरी तरह कहां समाप्त समाप्त हुई हैं ?
बेशक सत्ता और व्यवस्था की खामियां गिनाने से अधिक हमें अपनी मानसिकता पर भी प्रश्न करने होंगे। हम उपभोक्ता और अधिकारों के प्रति जागरूक व्यक्ति तो बन गए हैं मगर कर्तव्यों के प्रति रत्ती भर भी सजग नहीं हुए। हम बेहतर सड़क तो चाहते हैं परन्तु यातायात नियमों का पालन नहीं करना चाहते। स्वच्छ शहर तो चाहते हैं लेकिन कचरा सड़क पर फेंकने से भी बाज नहीं आते । भ्रष्टाचार को तो कोसते हैं, लेकिन सुविधा के लिए सबसे पहले रिश्वत देने को आतुर हो उठते हैं। हम आज भी जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और राजनीतिक पहचान की संकीर्णताओं में फंसे हुए हैं। शायद इसी का फायदा उठा कर देश की राजनीति भी यह समझने को तैयार नहीं है कि लोकतंत्र का अर्थ केवल अपनी पसंद की सरकार चुनना नहीं, बल्कि असहमति को सम्मान देना भी है। भला आलोचना को देशद्रोह और प्रश्न पूछने को विरोध समझने की प्रवृत्ति से कैसे हम अपने लोकतंत्र को पोषित कर सकेंगे ? क्या ही अच्छा हो कि अपने विकास का पैमाना हम केवल जीडीपी, एक्सप्रेसवे और ऊंची इमारतों से ही नहीं वरन् इस नजरिए से भी आंकें कि क्या सामान्य भारतीय सम्मान के साथ जीवन जी रहा है ? क्या उसके बच्चे को अच्छी शिक्षा मिल सकती है ? क्या बीमारी की स्थिति में उसका परिवार आर्थिक रूप से तबाह तो नहीं होगा? क्या उसे योग्यता के आधार पर अवसर मिलेगा ? और क्या वह बिना भय के अपनी बात कह सकता है? आज़ादी के 80 वर्ष हमें गर्व करने का अधिकार तो देते हैं लेकिन साथ ही यह भी सिखाते हैं कि हमें अब ऐसे भारत का निर्माण करना है जिसमें अंतिम व्यक्ति भी यह महसूस करे कि देश की प्रगति उसकी अपनी प्रगति है । तभी आज़ादी के अगले दशक वास्तव में उस सपने के करीब पहुंचेंगे जिसके लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष किया था। वरना किसी मचान पर खड़े होकर लफ्फाजी तो कुछ भी की जा सकती है।

