रवि अरोड़ा
विचलित कर देने वाली ख़बर थी कि मात्र बीस हजार रूपये के लिए अपनी बहन के कंकाल को लेकर एक वृद्ध बैंक पहुंच गया । ओडिशा के क्योंझर जिले के जीतू मुंडा के लिए यह रकम शायद जीने का सहारा ही रही होगी, जो उसके लिए वह बैंक के चक्कर लगा रहा था । एक अशिक्षित आदिवासी मृत्यु प्रमाण पत्र, वसीयत और दर्जनों सर्टिफिकेट्स की सांप सीढ़ी से जब पार नहीं पा सका तो सबूत के तौर पर बहन का शव ही उठा लाया ताकि साबित कर सके कि बहन सचमुच मर चुकी है। हैरानी की बात नहीं थी कि इस खबर के बाद देश भर में सोशल मीडिया पर लोग बाग फट पड़े । संवेदनशील लोगों की नजर में यह गरीबी नहीं वरन् सिस्टम की हार थी। यह सवाल एक बार फिर मौजू हो उठा कि नियम पहले हैं अथवा इंसानियत ? एक गरीब आदमी जिसे नियम नहीं केवल अपनी भूख समझ आती है, उसे अपना हक पाने के लिए अभी और कितने अपमान के लिए खुद को तैयार करना होगा ?
हो सकता है कि देश की जीडीपी के दरें हमको लुभाती हों और हम देश में प्रति व्यक्ति आय के बढ़ते आंकड़ों पर हमें गर्व होने लगता हो मगर क्या इतने भर से हम अपने देश के आर्थिक हालात समझ सकते हैं ? यदि हां तो ये जीतू मुंडा किस दुनिया में रहता था ? बताया तो हमें यही जाता है कि भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है । जीडीपी की वृद्धि दर, डिजिटल भुगतान का विस्तार, स्टार्टअप संस्कृति, विदेशी निवेश और बुनियादी ढांचे के बड़े प्रोजेक्ट्स के बीच एक चमकदार भारत की तस्वीर भी हमें दिखाई जाती है। लेकिन क्या यही असली भारत है ? यदि हां तो वह भारत कौन सा है जहां मात्र घरेलू गैस महंगी होना करोड़ों लोग झेल नहीं पाते और हमारे भव्य शहर छोड़ कर अपने गांव लौटने लगते हैं ? वह कौन सा भारत है जो हर महीने घर का बजट बनाते समय टूटता है और जिसे मां बाप के इलाज और बच्चों की पढ़ाई के बीच किसी एक का चुनाव करता पड़ता है ? जो लगभग रोज बढ़ती महँगाई के सामने अपनी आय को सिकुड़ता हुआ महसूस करता है।
आंकड़े बताते हैं कि देश का अस्सी फीसदी श्रम असंगठित क्षेत्र में है और जहां न तय वेतन है और न सामाजिक सुरक्षा । न पेंशन है और न स्वास्थ्य सुरक्षा। ऐसे में बीमारी, दुर्घटना या काम छूटने का सीधा मतलब है परिवार की रीढ़ टूटना। बढ़ती महंगाई आम आदमी की सबसे बड़ी अदृश्य दुश्मन बन चुकी है और निम्न ही नहीं कथित मध्यम वर्ग भी अपनी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर लुटा रहा है । हैरानी की बात नहीं कि संयुक्त राष्ट्र से जुड़े खाद्य आकलनों के अनुसार भारत में लगभग 19 करोड़ से अधिक लोगों के सामने दो वक्त की रोटी का संकट है। क्या फिर भी हम यह दोहरा कर खुश हो सकते हैं हम दुनिया के सबसे बड़े खाद्यान्न उत्पादकों में से एक हैं ? क्या उस उत्पादन के कोई मायने हैं जो करोड़ों लोगों की क्रय शक्ति से बाहर हो ? किसी और के कहने पर क्यों जाएं, स्वयं नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार लगभग देश की 11 परसेंट से अधिक आबादी अभी भी बहुआयामी गरीबी में है यानी लगभग पंद्रह करोड़ लोग । अव्वल तो लोगों के पास रोजगार नहीं है और यदि है भी तो कर्ज़ का जाल आम आदमी की कमर तोड़ रहा है। किसान लागत और बाज़ार के बीच फँसा है, जबकि शहरी भारत में मध्यम वर्ग किश्तों, किराया और बच्चों की पढ़ाई के दबाव में जी रहा है । देश में आय की असमानता अब कोई खबर नहीं रही । हां यह खबर जरूर है कि जीडीपी के साथ साथ अब आम आदमी का तनाव भी बढ़ता जाता है। अर्थव्यवस्था का वास्तविक मूल्यांकन बेशक आप शेयर बाजार से कीजिए मगर आम आदमी के हाथ में रसोई के बजट, मकान का किराया, अस्पताल के बिल और स्कूल की फीस के बाद महीने के अंत में क्या कुछ बचा अथवा नहीं यह भी जानिए । देश कितना कमा रहा यह जानकार खुश होने के साथ साथ यदि एक हिंदुस्तानी कितना सुरक्षित और स्थिर जीवन जी पा रहा है, इसे भी तो अपनी खुशियों में शामिल कीजिए । देश के ये अनगिनत जीतू मुंडा भी हमारे हम वतन हैं, चुनाव में कौन जीता अथवा कौन हारा , यह जानने के साथ साथ इन जीतू मुंडाओं की खोज खबर भी तो हमको रखनी पड़ेगी ।

