रवि अरोड़ा
नीदरलैंड की राजधानी एम्स्टर्डम के एक मॉल के बाहर एक छोटी बच्ची असहाय लोगों के सहायतार्थ फूल बेच रही थी। वह बच्ची मॉल में आते जाते हर व्यक्ति से फूल खरीदने का अनुरोध कर रही थी मगर लोग बाग़ उसे नो थैंक्स कह कर आगे बढ़ जाते थे। यह सब देख रही एक भारतीय महिला ने उस बच्ची से पूछा कि बिटिया आज तुम्हें दिन भर में कितने फूल बेचने हैं ? इस पर उस बच्ची ने जो जवाब दिया वह कम से कम भारतीय समाज के लिए तो सोच से भी परे की चीज है। उस बच्ची ने बताया उसे फूल बेचने का नहीं वरन् सौ लोगों से इनकार सुनने का टास्क मिला है। इस पर पीछे खड़ी उस बच्ची की शिक्षिका सामने आई और उसने बताया कि जीवन की नाकामियों के प्रति बच्चों को तैयार करने के लिए ही उनके स्कूल ने यह अनोखा तरीका अपनाया है। इस किस्से को पढ़ कर मुझे न जाने क्यों विपक्ष के नेता राहुल गांधी की बहुत याद आई । अवश्य ही राहुल गांधी को भी जीवन को कोई ऐसा शिक्षक मिला होगा , जिसने जीवन के उतार चढ़ाव, सफलता असफलता, मान अपमान और जीवटता संबंधी ऐसा पाठ उन्हें पढ़ाया जो कम से भारतीय राजनीति में अन्य किसी नेता ने तो नहीं पढ़ा । वरना ऐसे कैसे हो सकता है कि एक दशक तक जिस व्यक्ति को पप्पू कह कर एक खास वर्ग ने अपमानित किया और उसके मुखालिफ दल ने उनकी छवि धूमिल करने को हजारों करोड़ रुपये फूंक दिए मगर वह व्यक्ति निर्विकार भाव से अपने काम में लगा रहा और आखिरकार ऐसा वक्त भी आ गया जब मुल्क की दशा और दिशा संवारने को लोग बाग़ उनकी ओर उम्मीद भरी निगाहों से देखने लगे हैं। मुझे यह स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं है कि एक लंबे अरसे तक मुझे भी राहुल गांधी से भारतीय राजनीति में कुछ खास कर गुजरने की उम्मीद नहीं थी । रही सही कसर उस दिन पूरी हो गई जब जुलाई 2018 में अविश्वास प्रस्ताव के बाद बेहद नाटकीय ढंग से वे भरी संसद में नरेंद्र मोदी में जाकर जबरन गले मिले और बाद में अपनी सीट कर आकर अपने तत्कालीन साथी सिंधिया को आंख मारने लगे । राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस द्वारा 99 विधानसभा और लोकसभा चुनाव हारने से भी मुझे अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता नहीं जान पड़ी। बेशक इस दौरान उन्होंने कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल में पार्टी की सरकार भी बनवाई मगर उसे कोई बड़ी सफलता औरों की तरह मैने भी नहीं माना । साल 2014 और 2019 के आम चुनावों में कांग्रेस द्वारा मात्र पर 44 और 52 सीटों पर सिमट जाना भी बताता था राहुल गांधी से देश कोई खास उम्मीद नहीं रखता है। मगर उसके बाद चीजें बदलना शुरू हुईं या यूं कहिये राहुल गांधी बदलना प्रारंभ हुए । सत्ता की तमाम खुराफातों के बावजूद साल 2024 में कांग्रेस का आंकड़ा 99 सांसदों तक जा पहुंचा और राज्यों में भी उसकी ताकत बढ़नी प्रारंभ हो गईं। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा ने तो जैसे रातों रात उनकी छवि को ही बदल दिया । बाद में भारत जोड़ो न्याय यात्रा ने भी सोने पर सुहागे का काम किया । इस दौरान वे चार हजार किलोमीटर से अधिक कन्याकुमारी से कश्मीर तक पैदल चले और आम लोगों के बीच बेतकल्लुफी से पहुंचे। इस यात्रा के दौरान और बाद में वे अपनी अनोखी जन संपर्क शैली से भी लोगों की निगाहों में चढ़े, जिसमें वे कामगारों, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों और आम मजदूरों की समस्याओं के प्रति जिज्ञासु भाव में नजर आये । आज भी राहुल गांधी बिना किसी पूर्व तय कार्यक्रम या लाव-लश्कर के अचानक कामगारों के बीच पहुंच जाते हैं । वे कभी ट्रक में बैठे किसी ड्राइवर से बतियाते नजर आते हैं तो कभी लेबर चौक पर दिहाड़ी मजदूरों से उनका हाल लेते मिलते हैं। बेशक विरोधी उन्हें युवराज जैसे तंज से नवाजें मगर मजदूरों के साथ जिस सहजता से वे जमीन अथवा फुटपाथ पर बैठे मिलते हैं, वैसा कोई दूसरा उदाहरण आज की राजनीति में तो अन्यत्र नहीं मिलता । वे किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अलग-अलग पेशों से जुड़े लोगों तक पहुंचते हैं। रेलवे लोको पायलट, डीटीसी बस ड्राइवर्स, निर्माण मज़दूरों, गिग वर्कस के बीच भी उन्हें सहजता से देखा गया । हाल ही छात्र आंदोलन और एसआईआर जैसे मुद्दों पर राहुल को जो जुझारू रूप देश दुनिया ने देखा वह तो जैसे अभूतपूर्व था । बारह साल में दर्जनों एफआईआर, निलंबन, तमाम एजेंसियों के छापों और कदम कदम पर दुश्वारियों का तो जैसे राहुल गांधी पर कोई असर ही नहीं हुआ । धरने प्रदर्शनों के दौरान धक्का मुक्की व सड़क पर घसीटे जाने का भी उनपर कोई असर नहीं दिखा । बेशक राहुल का राजनीतिक सफर नेहरू-गांधी परिवार की विरासत से शुरू हुआ था मगर आज का राहुल गांधी वह तो कतई नहीं है जिसे हमारे दिमागों में जबरन ठूंसा गया था। पता नहीं आप राहुल गांधी के राजनीतिक भविष्य को किस तरह से देखते हैं मगर जमीन से जुड़ने की ललक लिए अपारम्परिक राजनीति करने वाला उन जैसा कोई अन्य नेता कम से कम भारतीय राजनीति में तो आप नहीं ढूंढ सकते ।

