रवि अरोड़ा
मैं गालियां देने वालों के बीच ही रहता हूं। बचपन से ही मित्र मंडली गालियां देती और सुनती आई है। लोग उसे भी मां की गाली दे देते हैं जिसकी मां को अपनी मां जितना प्रेम करते हैं। बहन की गाली देते समय भी कभी किसी को खयाल नहीं रहता कि सामने वाले की बहन को भी तो हम अपनी बहन जैसा मानते हैं। हां साजिश किसी को स्वीकार्य नहीं होती । कम से वह साजिश तो कतई नहीं जिसमें सामने वाले के नुकसान की कामना हो और अपनी मूंछ ऊंची करने का भाव हो । जंतर मंतर पर जेन जी पीढ़ी द्वारा सत्ता नशीं लोगों को दी गई गालियां और दूसरी ओर से छात्रों के आंदोलन पर तरह तरह के आरोप लगाने और उनको शारीरिक रूप से हानि पहुंचाने को भी मैं उसी नजर से देखता हूं । यकीनन गन्दी और भद्दी गालियां नहीं दी जानी चाहिए । ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को तो बिल्कुल नहीं । मैं भी इसकी निंदा करना चाहता हूं मगर इन अर्थहीन और हवा हवाई गालियों से पहले मैं निंदा करता हूं निहत्थे छात्रों पर लाठी चार्ज, आंसू गैस और पेलेट गन चलाने तथा बिना वर्दी और फर्जी वर्दी में बच्चों की बेरहम पिटाई की । प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने तो मात्र इच्छा जताई है कि मैं गाली देने वालों को माफ करना चाहता हूं। मगर पिटे छात्र छात्राओं ने तो तमाम जुल्मों के बावजूद उन्हें माफ भी कर दिया और अपने अपने घरों को लौट गए । पिछले बारह साल में मोदी जी की इस सबसे बड़ी हार के तमाम कारण गिनाये जा रहे हैं मगर मेरी नजर में यह मोदी जी द्वारा तैयार की गई पिच पर बच्चों के द्वारा खेलने से इनकार के चलते संभव हुआ । मोदी सरकार ने इस बार भी अपने पुराने और मंझे हुए हथियार साजिशों को धार दी मगर युवाओं ने खेल उनकी नहीं वरन् अपनी पिच पर खेला और हैरानी की बात यह कि खेल के नियम भी खुद तय किए । सरकार ने न केवल उन्हें राष्ट्रद्रोही, चीन के एजेंट, और विदेशी फंड पर पलने वाला बताया बल्कि अपने जेबी मीडिया के द्वारा भी उन्हें जम कर बदनाम करने की कोशिश की । मगर बदले में आंदोलनरत बच्चों ने केवल नारे लगाए, पोस्टर हाथ में उठाए और गालियां दीं। बेशक मोदी सरकार में भी एक से बढ़ कर एक गालीबाज़ हैं । स्वयं मोदी जी भी इस मामले में दूध के धुले नहीं हैं मगर गालियों की पिच पर युवाओं की मौलिकता और नए नए रूपक घड़ने की कला से भला कोई बूढ़ा अथवा अधेड़ नेता कैसे मुकाबला कर सकता था। नतीजा साजिशों के मुकाबले में गालियां जीत गईं और मोदी सरकार ने हाथ खड़े कर दिए । आंदोलन के दौरान लड़कियों द्वारा कथित तौर प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों संतरियों को गालियां दिए जाने से देश के कथित संस्कारी लोग बेहद तमतमाए हुए हैं। जिसे देखो वही संस्कृति और मर्यादा की दुहाई दे रहा है। यकीनन मुझे भी यह सब देख कर कोई खुशी नहीं हुई मगर इसका दोष इन युवाओं से पहले मैं अपनी उस पीढ़ी को देना चाहता हूं जो अपने इन बच्चों को अपनी उम्मीदों पर खरा उतरने वाला नहीं बना पाई । वैसे यह ठीक ही तो है। हमारी पीढ़ी भी कौन सा दूध की धुली हुई है। आज के तमाम चोर, उचक्के, बेईमान, भ्रष्टाचारी और चरित्रहीन व्यक्ति क्या हमारी ही पीढ़ी के लोग ही नहीं हैं। मंदिरों के दान पात्रों में चोरी, बलात्कारों का स्वागत और उन्हें ऊंचे ऊंचे पदों पर बैठाने, एक से बढ़ कर एक बेईमान को अपना नेता स्वीकार करने, भ्रष्टाचारियों को सलाम करने और ईमानदार का उपहास उड़ाने जैसे पाप क्या हमारी झोली में नहीं हैं ? क्या गालियां इससे भी अधिक बुरी हैं ? वैसे कहां से आए ये बच्चे ? क्या ये हमारे आपने नहीं हैं ? हमने इन्हें जो सिखाया वही तो लौटा रहे हैं ? संयुक्त परिवारों से निकल कर दबड़े नुमा घरों में उन्हें अकेला छोड़ कर कौन सी परवरिश हमने उन्हें दी ? मोबाइल फोन के जमाने और मां बाप के अपने अपने काम पर चले से जाने से उपजे एकाकीपन से हम और क्या उम्मीद कर रहे थे ? अब क्यों हम बिलबिला रहे हैं ? जरा देखिए! हमसे भी ज्यादा कुपित तो खुद प्रधानमंत्री हैं जो खुद माफी मांगने की बजाय इन बच्चों को माफ करने की नौटंकी कर रहे हैं । यह सब करके क्या वे और अधिक गालियों को आमंत्रित नहीं कर रहे ? विद्वान कहते हैं कि फूल और गालियां दोनों ही सार्वजनिक जीवन के अभिन्न अंग हैं। जो इसे अपनाएगा, उसे इसके लिए तैयार रहना होगा । नेहरू और गांधी जैसे लोग मरने के 70 – 75 साल बाद भी कुछ लोगों से आजतक गालियां खा रहे हैं तो ये आज के नेता भला क्या चीज हैं। हमारा लोकतंत्र को अभी शैशव काल में ही है। दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका को देखिये, वहां तो पब्लिक अपने नेताओं को क्या क्या नहीं कह डालती । आप बच्चों को पीटो और वह गाली भी न दें, ऐसा भला कैसे हो सकता है। पिटते समय तो हर कोई गाली देता है। यह तो मानवीय स्वभाव है। हताशा व्यक्त करने का इससे उपयुक्त भी कोई और भाव होता है क्या ? बताइए मोदी जी ।

