रवि अरोड़ा
यह बात अगस्त 1990 की है। तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह नीत जनता दल सरकार द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के खिलाफ देश भर के छात्र आंदोलनरत थे और अनेक छात्रों ने आत्मदाह तक कर लिया था । इसी तूफान के बीच हम कुछ पत्रकारों को वीपी सिंह से मिलवाने उनके घर ले जाया गया था । उनसे मिलने पर मैंने पाया कि वे आत्मग्लानि से मरे जा रहे थे । मेरे एक सवाल पर उन्होंने बताया कि शुरू शुरू में जब छात्रों द्वारा आत्महत्या की खबरें उन्हें मिलीं तो वे घबरा गए और उन्होंने स्वयं को एक कमरे में बंद कर लिया था । बकौल उनके रोजाना बोरा भर भर का उन्हें लोगों की चिट्ठियां मिल रही हैं जिसमें लोगबाग जी भर कर गालियां लिख रहे हैं । देश भर में फैल चुके छात्र आंदोलन का असर था अथवा वे चिट्ठियां काम कर रही थीं कि ऐसी कमरे में भी वीपी सिंह की हथेलियों पर पसीने छूट रहे थे और वे बार बार रुमाल से अपनी हथेलियां पोंछ रहे थे । अब बात ताजा हालात की । विगत 17 सितंबर को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्म दिन पर देश भर से आशीर्वाद का दिया जलाने की अपील की गई मगर जनता तो दूर अधिकांश भाजपाइयों ने भी ऐसा नहीं किया । यही नहीं सोशल मीडिया पर लोगों द्वारा मोदी जी की मुंह भर भर कर लानत मलानत की गई सो अलग । यही सब देख कर एक सवाल दिमाग में कौंधा कि इसपर मोदी जी की प्रतिक्रिया क्या रही होगी ?हमेशा की तरह भाजपा के आईटी सेल ने जब सोशल मीडिया पर जन्मदिन संबंधी पोस्ट विभिन्न मीडिया संस्थानों से डलवाई तो हैरानकुन प्रतिक्रिया यह हुई कि 99 फीसदी लोगों ने प्रधानमंत्री का मजाक ही उड़ाया। कमेंट में वह सब भी लिखा गया जिसकी भाजपा, उसके आईटी सेल, मोदी जी और उनके चाहने वालों ने तो कतई उम्मीद नहीं की होगी । काश कोई ऐसा जरिया होता जिससे पता चलता कि क्या यह सब देख कर मोदी जी के भी वीपी सिंह की तरह पसीने छूटे और उन्होंने भी खुद को किसी कमरे में बंद कर लिया अथवा अपने चिर परिचित अंदाज में उन्होंने लथ्थी चढ़ी की परवाह नहीं की और कपड़े झाड़ पर फिर खड़े हो गए ?जानकर बताते हैं कि लखनऊ का एक मोहल्ला है पीर बुखारा । कभी वहां के शौहदे और शौहदन बेहद मशहूर हुआ करते थे । इन शौहदों और शौहदनों यानी छिछोरे लोगों का काम होता था पैसे लेकर किसी इज्जतदार नवाब के पक्ष में उसके मुखालिफों की लानत मलानत करना । उस दौर में लखनऊ में यह मुहावरा मशहूर हो गया था कि पीर बुखारा के शौहदे/शौहदन हो क्या ? यदि कोई आदमी अथवा औरत बिला वजह उलझे तो लखनऊ में उसे यही कह कर ताना मारा जाता था । किससे छुपा है कि भाजपा का भी अपना एक पीर बुखारा है और पिछले बारह सालों से अपने विरोधियों से निपटने को पार्टी ने उसे मैदान में छोड़ रखा है। सोशल मीडिया पर मोदी जी अथवा भाजपा के खिलाफ कोई छोटी सी पोस्ट भी यदि आती है तो ये शौहदे उस पर टूट पड़ते हैं। इस कदर थुक्का फजीहत करते हैं कि लिखने वाला त्राहिमाम त्राहिमाम कर उठता है मगर दिल्ली जंतर मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के बाद सारी बिसात जैसे उलट गई है। पीर बुखारा के मुकाबिल शायद कोई बड़ा पीर बुखारा मैदान में आ गया है। स्पष्ट दिखाई दिया कि जंतर मंतर के आंदोलन में जेन जी की भाषा से घबरा कर ही भाजपा सरकार ने हथियार डाले थे । सोशल मीडिया के इस दौर में अब जेन जी के साथ शायद हर उम्र का आदमी जुड़ गया है और मोदी जी के जन्म दिन पर सभी ने अपनी भड़ास निकाली । एक बानगी भर देखिए कि बीबीसी न्यूज हिंदी ने अपने सोशल मीडिया पेज पर एक पोस्टर शेयर करते हुए लोगों से पूछा था कि जन्म दिन पर आप पीएम मोदी को कौन सा गिफ्ट देना चाहेंगे ? इसके हजारों जवाबों में 99 फीसदी लोगों ने जो लिखा वह यहां नहीं लिखा जा सकता । भद्दी भद्दी गालियों से घबरा कर शायद पहली बार बीबीसी हिंदी ने कमेंट बॉक्स में लिखकर लोगों से अनुरोध किया कि “कृपया मर्यादित भाषा का ही प्रयोग करें, भाषा की मर्यादा जरूरी है।” मगर लोग बाग़ नहीं माने । इसपर संस्थान को आखिरकार उस पोस्ट का कमेंट सेक्शन ही बंद करना पड़ा । अन्य पोस्टर और पोस्ट्स के साथ भी यही कुछ हुआ । यकीनन ऐसी भाषा और ऐसा व्यवहार कतई स्वीकार नहीं है। यदि हमें अपने लोकतंत्र को बचाना है तो मर्यादाओं में रहना तो सीखना ही होगा मगर यह बात हर सूरत दोनों पक्षों पर लागू होती है। आप पीर बुखारा बनाएंगे तो सामने से ग्रेटर पीर बुखारे के उठ खड़े होने का खतरा तो रहेगा ही ।

