नया मंत्र ‘ साडा हक, एत्थे रख ‘

रवि अरोड़ा

सबसे पहले तो डिस्क्लेमर यानी अस्वीकरण के तहत मैं स्पष्ट कर दूं कि आपकी तरह लोकतंत्र में मेरा भी अटूट विश्वास है और मैं भी किसी सूरत रेवड़ी संस्कृति का तरफदार नहीं हूं । मगर फिर भी तमिलनाडु के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय द्वारा शपथ लेते ही जिस प्रकार राज्य वासियों को दो सौ यूनिट मुफ्त बिजली देने का आदेश जारी कर दिया गया, उससे मुझे बेहद खुशी हुई । कोई कारण नहीं कि उनके उन वादों पर भी यकीन न किया जाए, जिनके तहत उन्होंने महिला परिवार प्रमुखों को ढाई हजार रुपए मासिक, मुफ्त एलपीजी, गरीब परिवारों की दुल्हनों को आठ ग्राम सोना, महिलाओं को पांच लाख रुपए तक ऋण, बेरोजगारों, बुजुर्गों, विधवाओं और अपाहिजों को भत्ता और किसानों की ऋण मुआफी जैसी घोषणाएं चुनावों में की थीं। बेशक पूछा जा सकता है कि जिस गरीब राज्य का कुल बजट ही बामुश्किल साढ़े तीन लाख करोड़ रुपया है, वहां इस तरह की फजूलखर्ची को पैसा कहां से आएगा ? पैसे ऐसे ही लुटाए जाएंगे तो विकास कार्य कैसे होंगे ? कुछ ऐसे ही सवाल दिल्ली, पंजाब, मध्यप्रदेश, वेस्ट बंगाल, बिहार और महाराष्ट्र के चुनावों के समय भी उछाले गए थे । बेशक संविधान के आधा दर्जन अनुच्छेद कल्याणकारी राज्य की स्थापना हेतु ऐसे तमाम कार्यों की अनुमति देते हैं बावजूद मैं भी स्वीकार करता हूं कि चुनाव जीतने को मुफ्त रेवड़ियां बांटने की परंपरा देश के हित में नहीं है मगर फिर भी यह सवाल करने से आप मुझे कैसे रोक सकते हैं कि क्या किफायत का सारा ठेका जनता ने ही ले रखा है ? किफायत के नाम पर हर बार गरीब की झोली में कुछ डालने से ही गुरेज क्यों ? किससे छुपा है कि देश की अमूल्य संपदा खुले आम चंद उद्योगपतियों, नेताओं और अफसरों और उनके दलालों द्वारा सरेआम लूटी जा रही है और डेढ़ सौ करोड़ लोग तमाशा देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पा रहे । ऐसे में यदि थोड़ा सा हिस्सा कोई नेता चुनाव जीतने को गरीब के घर भी पहुंचा रहा तो क्या पाप हो रहा है ?कोई नहीं बता रहा कि रेल, बंदरगाह, सामरिक महत्व के टापू, हवाई अड्डे, बिजली और सड़क और तमाम ठेके एक ही आदमी को क्यों दिए जा रहे हैं ? कैसे देश की आधी संपदा एक फीसदी हाथों में पहुंच गई ? तमाम सरकारी विभागों में चालीस चालीस फीसदी तक की कमीशन, नेताओं की ब्रांडिंग को सालाना हजारों करोड़ रूपयों के विज्ञापन, एक दिन को माननीय बनने पर भी पेंशन और फौजियों को पेंशन न देनी पड़े इस लिए अग्निवीर जैसी योजनाएं, गैर जरूरी सड़कें, पुरानी योजनाओं के नाम बदल बदल का नए नए उद्घाटन और न जाने क्या क्या , क्या इनसे भी देश में किफायत ही हो रही है ? चलिए लोकतंत्र की ही बात कर लीजिए। ईडी, सीबीआई और आयकर के बल पर विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं का चीर हरण करो और जब वे आपकी पार्टी में आ जाएं तो क्लीन चिट देकर मंत्री मुख्यमंत्री बना दो । गोदी मीडिया, जेबी चुनाव आयोग और तमाम नतमस्तक इदारे क्या इसी लोकतंत्र का ही हिस्सा हैं ? कोई नहीं बता रहा राफेल का सच, किसी को नहीं पता इलेट्रॉरल बॉन्ड का क्या मामला था , पी एम केयर फंड क्या बला थी किसी को नहीं पता , कैसे अमेरिका के आगे हम लेटे , स्वदेशी स्वदेशी का राग अलापते अलापने क्यों पूरा मुल्क चीन मय हो गया । क्या यह सब भी देश में किफायत हेतु किया गया ? अनपढ़ मंत्री बन रहे हैं अपराधी मुख्यमंत्री, जिनके शरीर में सीधे खड़े होने की ताकत नहीं वे स्वास्थ्य मंत्री। नेताओं के लप्पू झन्ना बेटे अरबों पति हो गए और दशकों तक दरी बिछाने वाले दरी ही बिछाते रह गए । सौ की एक बात जब खादी धारियों के लिए राजनीति एक बिजनस मॉडल है तो फिर जनता से ही सारी उम्मीद क्यों ? जनता भी अपने वोट को बिजनस मॉडल क्यों न बनाए ? वो उसे वोट क्यों न दे जो उसका हिस्सा भी दे। लोकतंत्र का रोना मत रोइए । इतिहास और तहज़ीब का पाठ मत पढ़ाइए । इतिहास भूखों का खिलौना है और तहज़ीब भरे पेट वालों का तमाशा ।
पूरी जिम्मेदारी उस गरीब आदमी की नहीं है जिसका चूल्हा ठंडा है। सवाल उनसे कीजिए जो मलाई काट रहे हैं। सुधार ऊपर से शुरू होता है । और हां ! मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, भत्ते और नकदी बांटे जाने पर नाक मुंह मत सिकोड़िए। समझ लीजिए । अब जनता सयानी है। उसने भी कहना सीख लिया है कि साडा हक, एत्थे रख । जमाना भी अब बस उन्हीं नेताओं का है जो खुद बेशक खाए मगर जनता को भी उसका हिस्सा दे।

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