रवि अरोड़ा
जिस कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर कुछ लोगों को हंसी आ रही है अथवा किसी किसी की नींद हराम है, वह भविष्य में क्या गुल खिलाएगी यह तो खैर कोई नहीं जानता । मगर दुनिया का इतिहास गवाह है कि मज़ाक भी कभी कभी आंदोलन का रूप ले लेते हैं और एक व्यंग्य भी सत्ता को असहज कर देता है । कोई हैरानी नहीं कि भारतीय बेरोज़गार युवाओं के प्रति सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायाधीश द्वारा की गई एक विवादित टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर शुरू हुआ यह व्यंग्यात्मक अभियान देखते ही राजनीतिक विमर्श का हिस्सा ही बन गया। वैसे इसे दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास में कोई नया प्रयोग भी नहीं कह सकते । साल 1980 के दशक में ब्रिटेन में बनी ऑफिशियल मॉनस्टर रेविंग लूनी पार्टी भी ऐसा कर चुकी है । पारंपरिक राजनीति का मज़ाक उड़ाने के लिए ही उसने चुनाव लड़ना शुरू किया था। उसके विचित्र घोषणापत्रों को पहले किसी ने गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन समय के साथ वह ब्रिटिश राजनीति में “प्रोटेस्ट वोट” का प्रतीक बन गई। इसी तरह आइसलैंड में भी 2008 की आर्थिक मंदी के बाद हास्य कलाकार जॉन ग्रेन ने “बेस्ट पार्टी” बनाई थी । उसने भी भ्रष्टाचार पर व्यंग्य किया और असंभव वादे किए और आश्चर्यजनक रूप से उसने राजधानी रेक्याविक का चुनाव भी जीत लिया। इस लिए कॉकरोच जनता पार्टी को हल्के में लेने वाले कृपया सावधान हो जाएँ। क्योंकि कोई भी व्यंग्य तब बेहद शक्तिशाली बन जाता है जब वह किसी वास्तविक सामाजिक पीड़ा को अभिव्यक्त कर रहा हो। यकीनन कोई हास्य कभी आंदोलन नहीं बनता मगर यदि उसके पीछे असंतोष, अपमान या उपेक्षा का अनुभव तो क्या कीजियेगा ?
देश में युवाओं की बड़ी आबादी रोजगार , प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक और अवसरों की कमी को लेकर लंबे समय से बेचैनी महसूस कर रही है। ऐसे माहौल में “कॉकरोच” जैसे शब्द को अपमान की बजाय पहचान में बदल देने के एक विचार ने प्रतीकात्मक ही सही मगर एक जवाबी राजनीतिक कार्रवाई तो की ही है। कोई हैरानी नहीं कि कुछ ही दिनों में यह अभियान सोशल मीडिया पर करोड़ों लोगों तक पहुँच गया और आप और मैं भी आज उनकी बात कर रहे हैं। वाकई सोशल मीडिया ने राजनीति का व्याकरण ही बदल दिया है। पहले आंदोलन सड़कों पर जन्म लेते थे और फिर अख़बारों तक पहुँचते थे। अब आंदोलन मीम, वीडियो और हैशटैग के रूप में जन्म लेते हैं और बाद में वास्तविक दुनिया में उतरते हैं। कॉकरोच जनता पार्टी ने भी यही रास्ता अपनाया। कुछ स्थानों पर इसके समर्थकों ने सफाई अभियान और स्थानीय गतिविधियों में भाग लेकर यह संकेत भी दिया कि वे केवल इंटरनेट तक सीमित नहीं रहना चाहते।
लेकिन इतिहास तो यह भी बताता है कि वायरल लोकप्रियता और राजनीतिक सफलता दो अलग-अलग चीज़ें हैं। सोशल मीडिया की भीड़ हमेशा वोट में परिवर्तित नहीं होती। दुनिया भर में ऐसी पार्टियां कुछ महीनों की चर्चा के बाद गायब भी तो हो गईं थीं । हां इटली का फाइव स्टार मूवमेंट जरूर एक ब्लॉग और व्यंग्यात्मक अभियान से शुरू होकर राष्ट्रीय राजनीति की निर्णायक शक्ति बन गया था। अंतर केवल इतना था कि उसने नाराज़गी को संगठन, नेतृत्व और ठोस एजेंडा में बदला।
यहीं से कॉकरोच जनता पार्टी के भविष्य का प्रश्न शुरू होता है जिसका सही सही उत्तर भविष्य के गर्भ में है।
अपने तईं इस पर विचार करते हुए मैं तीन संभावनाएँ देखता हूं। पहली संभावना तो यही है कि यह कुछ सप्ताह या महीनों की वायरल घटना बनकर ही रह जाए। इंटरनेट का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहाँ भारी उत्साह के बाद लोगों का ध्यान किसी नए विषय की ओर चला गया और फिर बाद में फिर कहीं गुम हो गया । दूसरी संभावना यह है कि वह एक स्थायी सामाजिक दबाव समूह का रूप ले ले और युवाओं के रोजगार, शिक्षा और परीक्षा प्रणाली से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाती रहे । ऐसे में यह चुनाव न लड़ते हुए भी वह सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित कर सकती है। तीसरी और सबसे चुनौतीपूर्ण संभावना यह है कि यह वास्तविक राजनीतिक संगठन में खुद को बदल ले । बेशक तीसरी संभावना बहुत कुछ बलिदान मांगती है और इसके लिए केवल मीम और युवाओं की नाराज़गी पर्याप्त नहीं होगी । स्थानीय इकाइयाँ, नेतृत्व संरचना, वित्तीय पारदर्शिता और स्पष्ट नीतियाँ विकसित करना इसकी पहली शर्त होगी । याद रखिए, भारत में पहले भी कई आंदोलन राजनीतिक दलों में बदले हैं लेकिन उनमें से अधिकांश को जब सत्ता और संगठन की कठिन वास्तविकताओं का सामना करना पड़ा था तो वे मिट गए।
खैर, भविष्य को फिलहाल जाने दें तब भी इतना तो स्वीकार करना ही होगा कि कॉकरोच जनता पार्टी की यह उपलब्धि भी कम नहीं है कि प्रतीकात्मक रूप से ही सही मगर उसने करोड़ों लोगों के बीच यह उम्मीद तो जगाई है आज का युवा अपमान को भी प्रतिरोध के औज़ार में बदल सकता है। रहा सवाल कॉकरोच जैसे शब्द का तो आंदोलन का भविष्य उसके नाम से नहीं, बल्कि उसकी क्षमता से तय होता है । इससे तय होता है कि वह लोगों की भावनाओं को संस्थागत शक्ति में बदल पाता है या नहीं। वैसे यदि कॉकरोच जनता पार्टी केवल एक मज़ाक ही बनी रहती है तो भी वह इंटरनेट इतिहास का सबसे रोचक अध्याय होगी। लेकिन यदि वह युवाओं की वास्तविक समस्याओं को संगठित राजनीतिक एजेंडे में बदलने में सफल होती है तो संभव है कि भविष्य के इतिहासकार इसे भारत की डिजिटल पीढ़ी के पहले बड़े व्यंग्यात्मक जनआंदोलन के रूप में अवश्य याद करें।

