विभिन्न समस्याओं को लेकर गाजियाबाद के उद्यमी आए आगे, मीडिया को सुनाया दुखड़ा

  • उत्पीड़नात्मक नीतियों और कानूनों के विरोध में उद्यमियों ने अपने आपको जंजीरों में बांधा
  • कहा-ईज आफ डूइंग मैन्युफैक्चरिंग शासन की प्राथमिकता में नहीं
  • बढ़ती जा रही हैं एमएसएमई उद्यमियों की समस्याएं एवं शासन बना है उदासीनता

गाजियाबाद। विभिन्न समस्याओं को लेकर एमएसएमई उद्यमियों ने एक राय होकर शासन पर उदासीनता का आरोप लगाया है। प्रेस कान्फ्रेंस कर कहा कि ईज आफ डूइंग मैन्युफैक्चरिंग शासन की प्राथमिकता में नहीं है। हालांकि उद्यमियों ने प्रदेश की योगी सरकार की उद्योगों के विकास को लेकर दिखाई गई रूचि की जहां प्रशंसा की वहीं शासन की उदासीनता भी गिनाई। आल इंडिया मैन्युफैक्चरर्स आॅगेर्नाइजेशन (यूपी स्टेट बोर्ड) के अध्यक्ष उपेंद्र गोयल ने प्रेसवार्ता के दौरान कहा कि केन्द्र सरकार के पिछले 12 वर्षों के एवं आदित्यनाथ योगी जी के नेतृत्व में पिछले 9 वर्षों के राज्य सरकार के शासन में औद्योगिक विकास द्रुत गति से हुआ है। केन्द्र सरकार द्वारा नीतिगत परिवर्तनों द्वारा औद्योगीकरण के विकास के लिये काफी प्रयत्न हुये हैं। प्रदेश शासन द्वारा भी सड़क, सुरक्षा और बिजली की निर्बाध उपलब्धता से औद्योगिक विकास को निश्चित रूप से गति मिली है।
इन सबके बावजूद यह भी सत्य है कि एमएसएमई उद्यमी जोकि वास्तव में उद्योगपति नहीं औद्योगिक किसान हैं, की समस्याओं की प्रदेश एवं केन्द्र शासन के सभी स्तरों पर पूर्ण अनदेखी हो रही है। उद्योग चलाने में आने वाली अनेक बाधाओं में से कुछ प्रमुख समस्याओं के प्रति हम आपका ध्यानाकर्षित करना चाहते हैं-

प्रदूषण

माननीय उच्चतम न्यायालय, एनजीटी के विभिन्न आदेशों एवं उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सैन्ट्रल ऐयर क्वालिटी मॉनीटरिंग (सीएक्यूएम) की दिल्ली-एनसीआर में दिन-प्रतिदिन बढ़ती दमनकारी नीतियों और उत्पीड़ानात्मक कार्यवाहियों से उद्यमी त्राहि-त्राहि कर रहे हैं और उद्योग बंद करके पलायन प्रारम्भ कर चुके हैं।

उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीसीडा)

शासन की विभिन्न नीतियों की वजह से यह प्राधिकरण पूर्ण रूप से अपने नाम से उल्टा यानि औद्योगिक विकास नहीं बल्कि उद्योगों को बंद कराने एवं औद्योगिक उत्पीड़न का पर्याय बन गया है। प्राधिकरण, शासन की नीति अनुसार कार्य करने को बाध्य है। शासन द्वारा इस संबंध में पिछले 7-8 वर्षों से उद्योगों द्वारा उठायी गयी सभी मांगों को बिना कोई कारण बताये सिरे से खारिज कर दिया जाता है। विभाग के नियम इतने सख्त हैं कि उद्योगों की दिन-प्रतिदिन की हर छोटी बड़ी गतिविधि के लिये वो प्राधिकरण की अनुमति के लिये बाध्य हैं। बाप अपने उद्योग में अपने बेटे को पार्टनर या डायरेक्टर नहीं बना सकता, जिससे नयी पीढ़ी उद्योगों से दूर होती जा रही है। ऐसी कई व्यापारिक गतिविधियां जिन्हे केन्द्र सरकार द्वारा उद्योगों की लिस्ट में शामिल किया गया है, उन्हें यूपीसीडा द्वारा उद्योग ना मानने की वजह से भी उद्यमियों को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। जैसे वेयरहाउसिंग केन्द्र सरकार द्वारा उद्योगों की फेहरिस्त में शामिल है किन्तु यूपीसीडा द्वारा इसे उद्योग ना मानने की वजह से ऐसे कई उद्यमी जिनके पास सरप्लस लैंड है या जो अपने उद्योग के खाली पड़े हिस्से में वेयरहाऊस या गोदाम बनाकर उसका पूर्ण उपयोग करना चाहते हैं, ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। अगर यूपीसीडा द्वारा इसे अनुमति दी जाये तो इससे रोजगार और रैवेन्यू दोनों में ही वृद्धी होगी। चीन का औद्योगिक विकास उनके द्वारा उद्योगों पर सभी बन्दिशें खोल देने की वजह से हुआ किन्तु वर्तमान में शासन उद्योगों को पूर्ण जकड़न मे रखना ही अपना धर्म समझता है, बहुत ही दुर्भाग्य का विषय है। इस संबंध में उद्यमियों की मांगें और समस्यायें सुनने और दूर करने के लिये राज्य स्तरीय समिति गठित की जानी चाहिये।

नगरीय विकास प्राधिकरणों द्वारा विकास शुल्क के नाम पर मनमानी

उत्तर प्रदेश राज्य विकास प्राधिकरण (यूपीसीडा) द्वारा अपने प्लॉट होल्डर्स से रुपये 125 प्रतिमीटर (लगभग) बने हुये शैड़स के क्षेत्रफल अनुसार, नक्शों के अनुमोदन के लिये जाते हैं। विडंबना है कि नगरीय विकास प्राधिकरणों द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में बनी हुयी या बनने वाली फैक्ट्रियों से रुपये 750 (ग्रामीण क्षेत्रों में) से रुपये 2500 (नगरीय क्षेत्रों में) तक के चार्जेज पूरे प्लॉट एरिया पर विकास शुल्क के नाम पर लिये जा रहे हैं। ये चार्जेज यूपीसीडा के मुकाबले 20 से 50 गुने हैं। क्या किसी भी मापदंड से एक ही राज्य में नगरीय विकास प्राधिकरण और राज्य विकास प्राधिकरण के उद्योगों के नक्शों के अनुमोदन शुल्क में इतना अंतर अन्यायपूर्ण और अनुचित नहीं है ?

रुग्ण इकाई पुनर्वासन नीति

हर जीवित प्राणी, चाहे वह इंसान हो, जानवर हो या मशीन, उसे अस्पताल/वर्कशॉप की जरूरत होती है। एमएसएमई भी जीवंत संस्थाएं हैं। उन्हें भी कभी-कभी मदद की जरूरत होती है। ऐसे में एमएसएमई की जरूरत पड़ने पर देश या प्रदेश में मदद की कोई नीति न होना उचित नहीं है। प्रदेश में रुग्ण इकाई पुनर्वासन नीति होनी ही चाहिये। इस नीति के लागू होने से छोटा उद्यमी निडरता से उचित फैसले लेकर अपने उद्योग को चला और बढ़ा सकेगा, जिससे प्रदेश में उद्योग उद्यमिता और रोजगार को बहुत बढ़ावा मिलेगा।

किराये पर औद्योगिक भूमि और औद्योगिक शैड्स की उपलब्धता

दिन प्रतिदिन बढ़ती जमीन की कीमतों की वजह से युवाओं का उद्यमी बनने का जज्बा दिन के सपनों की तरह बिखर रहा है। किराये पर औद्योगिक भूमि और शैड्स की उपलब्धता ना केवल बड़ी संख्या में युवाओं को उद्यमी बनने के लिये प्रोत्साहित करेगी, वरन् इससे औद्योगिक विकास और रोजगार को तीव्र गति भी मिलेगी।

समस्याएं अनेक हैं, समय व स्थान व परिस्थितियों के अनुसार बदलती हैं

समस्यायें अनेक हैं और वे समय, स्थान और परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती हैं। जिस प्रकार व्यक्ति जीवित है तो स्वास्थ्य संबंधी समस्यायें होनी लाजमी हैं, उसी प्रकार उद्योग चलेंगे तो समस्याओं का स्वरूप निरंतर बदलेगा। जरूरत है कि शासन एक प्रभावी “समस्या निवारण तंत्र (ग्रीवैंस रीड्रैसल मैकेनिज्म)” क्रियान्वित करे। वर्तमान में प्रदेश में कोई प्रभावी समस्या निवारण तंत्र नहीं है। 96 लाख रजिस्टर्ड एमएसएमईज के उत्तर प्रदेश में अगर शासन को यह लगता है कि उनकी निवेश नीति, औद्योगिक नीति, निर्यात नीति या अन्य संबंधित नीतियां इतनी प्रभावी और अपने आप में सम्पूर्ण हैं कि किसी उद्यमी को कोई समस्या होनी असंभव है तो यह दिन में सपने देखने जैसा है। शायद इसीलिये शासन की नजर में उद्यमियों के लिये किसी समस्या निवारण तंत्र की जरूरत नहीं है। प्रतीत होता है कि शासन पूर्ण आत्य मुग्धता की स्थिति में है और इस सोच से ग्रस्त है कि हममें और हमारी नीतियों में कोई कमी होनी असंभव है।

दो ताजे उदाहरण इस विषय में हम आपको बताते हैं

  • प्रदेश शासन द्वारा बंद फैक्ट्रियों के पुनर्विकास की अनुमति देने की नीति की कुछ माह पूर्व हुयी घोषणा में "रुग्ण इकायी घोषित होने" की शर्त लगाते हुये शासन और सलाहकारों की देश और प्रदेश में "रुग्ण इकायी घोषित किये जाने" संबंधी किसी भी कानून के ना होने की वास्तविकता से पूर्ण अनभिज्ञता विस्मयकारी है।
  • औद्योगिक परिसंपन्तियां रक्त संबंधियों में बिना किसी स्टाम्प ड्यूटी दिये रजिस्ट्री हो सकेंगी की नीति घोषित करते हुये शासन और सलाहकारों की इस विषय में पूर्ण अनभिज्ञता, कि औद्योगिक परिसंपंन्तियों का मालिकाना हक कंपनीज और फर्म्स के पास होता है जिनका कोई रक्त संबंधी नहीं होता, यह भी अपने आप में विस्मयकारी है।

उपरोक्त दोनों उदाहरणों से सिद्ध होता है कि उद्योग संबंधी नीतियां बनाते हुये शासन की कोई गंभीरता नहीं है। नीतियां सिर्फ घोषणा और प्रचार के लिये ही बनायी जा रही हैं और शासन, शासन के सलाहकारों ने औद्योगिक विकास के प्रति आंखे बंद कर रखी हैं। सबसे दुखद पहलू यह है कि उत्तर प्रदेश में शासन के इस व्यवहार से तंत्र पूर्ण रूप से उद्योग विरोधी और दमनकारी हो गया है। पिछले दो वर्षों से हमारे विभिन्न औधोगिक संगठनों द्वारा अनेक बार सीधे मेल करके और विभिन्न माध्यमों द्वारा मुख्यमंत्री का ध्यानाकर्षण इन समस्याओं की तरफ दिलाने के लिये मिलने का समय मांगने का प्रयास किया गया है, किन्तु इसका कोई जवाब नहीं मिला। प्रदूषण विभाग और सीएक्यूएम की ज्यादतियों के खिलाफ भी केन्द्रीय मंत्री भूपेन्दर यादव से कई बार मेल एवं उनके कार्यालय में फोन द्वारा समय मांगने का प्रयास किया गया लेकिन वहां से भी कोई जवाब नहीं मिला है।
गाजियाबाद के सभी औद्योगिक संगठनों का उत्तर प्रदेश के सभी उद्यमियों की ओर से प्रदेश और केन्द्र सरकार से इस प्रेस रिलीज द्वारा निवेदन है कि आपकी नीयत अच्छी है आपने हमें सड़क, सुरक्षा, बिजली एवं और कई सुविधायें देकर देश और प्रदेश के औद्योगिक विकास में मदद की है। हम यह भी नहीं भूले हैं कि पूर्व शासनों में व्यापारी और उद्यमी किस प्रकार हर वक्त असुरक्षा की भावना से ग्रस्त रहते थे। समस्या ये है कि आप ये सोचते हैं कि आपके कार्यों में पूर्णता है और उसमें किसी सुधार की जरूरत नहीं है। आपको आपकी नीतियों में बदलाव की जरूरत है, और उसके लिये औद्योगिक किसानों (एमएसएमई उद्यमियों) से मिलने, समझने की जरूरत है। यह भी जरूरत है कि शासन “ईज आॅफ डूइंग मैन्यूफैक्चरिंग” को वरीयता दे और उद्योग चलाने में शासन द्वारा बांधी गयी जंजीरों को खोलकर देश और प्रदेश के उद्यमियों को खुलकर उड़ान भरने और अपना उद्योग स्वतंत्रता से चलाने में सहायक बने, बाधक नहीं। इससे होने वाला अभतपूर्व औद्योगिक विकास देश और प्रदेश को विश्व में नित नवीन ऊचाईयों की ओर ले जायेगा। साथ ही साथ शासन से निवेदन है कि आपकी दमनकारी नीतियों द्वारा उद्यमियों का उत्पीड़न तुरंत बंद हो अन्यथा प्रदेश के सभी उद्यमी एक साथ बड़ा आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
प्रेसवार्ता के दौरान संजीव सचदेव, सुशील अरोड़ा, बृजेश अग्रवाल, मनोज शर्मा, संजीव गुप्ता, अनिल गर्ग, मंजीत सिंह, संजीव अरोड़ा, राजीव गुप्ता, अनुज शर्मा, सुरेन्दर अरोड़ा, रोहिताश गुलाटी, अश्विनी तनेजा, अनंत मित्तल, सतेन्द्र गौतम, दीपक एवं अन्य अनेक उद्यमी उपस्थित रहे। अंत में शासन की उत्पीड़नात्मक नीतियों और कानूनों के विरोध में उद्यमियों ने अपने आप को जंजीरों में बांधकर सांकेतिक रूप से दिखाया कि उद्यमी किस प्रकार अपने को जकड़ा हुआ महसूस कर रहे हैं।

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